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दीपक

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एक नन्हे से समंदर में, अपनी कस्ती चलता है …..
कस्ती में आग लगा के, दुनिया को रौशन करता है……

जब देखती है निशा तुझे, छुप जाती है कही पर्दे में….
इन्तजार में बैठी वर्षो से, की तुम कभी तो आँचल खिचोगे…

सहम के कहता है अँधेरा, छुए बिना मेरी परछाई को……
चिर देता है, मेरी गहराई , बिना किसी अंगड़ाई के …

देखते ही कहते है लाखो सितारे, सरोवर में हजारो, मेरे भीड़ को….
बुझा देती है मेरी दुनिया , अपनी कस्ती में आग लगा के …

नन्हा समंदर भी हुआ रौशन , मेरी कस्ती में लगी आग से…
सुख जाता है वो हर शाम, मेरे कस्ती में पड़े आंच से….

हो जाता है खाक ,आग जब तब निशा मुझे बुलाती है….
उठ जाओ मेरे प्यारे दीपक , अभी तो रात बाकी है………..
उठ जाओ मेरे प्यारे दीपक , अभी तो रात बाकी है……….

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