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मैं किसे गुनहगार कहूँ ....

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एक पंक्ति जो हम सब जानते है…
”इश्क वाले आँखों से, आँखों की बात समझ लेते है
ख्वाहिशो में मिले तो , मुलाकात समझ लेते है”……

इस पंक्ति के आगे मैंने दो फूल संजोएँ है….

अरे डूबता तो सूरज भी है, अपने चाँद के लिए….
लोग उनकी ख़ामोशी को, अंधियार समझ लेते है…

गम को पैमाने में सजाना, हक है मेरा….
लोग इस पैमाने को, शराब समझ लेते है….

जब भी रोता है अम्बर, अपनी धरती के लिए …
लोग उनके अश्क ,को बरसात समझ लेते है………

जलता है कोयला , अपने सोने के चमक के लिए …
लोग उसके अस्थियों को, राख समझ लेते है…

हर शाम जलता है दीपक, औरो के रौशनी के लिए …
लोग उनके अर्थी को, चिराग समझ लेते है……..

मैं किसे गुनहगार कहूँ …….मैं किसे गुनहगार कहूँ …….

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

January 14, 2013

लोगो के समझ का अच्छा इम्तहान लिया है आपने…………………और अंत में आपका सवाल…………मैं किसे गुनहगार कहूँ………………….सोलह आने जायज है……………….लिखते रहिये ………………एक अच्छी और खुबसूरत कोशिश है…………….


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